खंडहरों में छिपा चित्रकूट का सोमनाथ… अब खुलेगा सदियों पुरानी विरासत का रा
50 लाख से शुरू होगा संरक्षण अभियान, जमीन के नीचे दबे इतिहास की होगी वैज्ञानिक खोज
चित्रकूट। धर्मनगरी चित्रकूट की पहचान सिर्फ कामदगिरि, मंदाकिनी और रामायणकालीन स्थलों तक सीमित नहीं है। यहां की पहाड़ियों और जंगलों के बीच इतिहास के ऐसे अध्याय भी छिपे हैं, जिनकी परतें आज तक पूरी तरह सामने नहीं आ सकी हैं।
ऐसी ही एक अद्भुत ऐतिहासिक धरोहर है चर गांव का सोमनाथ मंदिर।
कर्वी से करीब 12 किलोमीटर पूर्व, कर्वी-मानिकपुर मार्ग के आसपास वाल्मीकि नदी के तट पर पहाड़ी पर स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर आज भी अपने आसपास बिखरे पत्थरों, शिल्प और भग्नावशेषों के जरिए एक पुराने वैभव की कहानी सुनाता है। जिला प्रशासन की पर्यटन वेबसाइट भी इसे प्राचीन सोमनाथ मंदिर के रूप में दर्ज करती है।
अब इतिहास की खुदाई होगी
सबसे बड़ी खबर यह है कि इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में अब बड़ा कदम उठाया गया है।
उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित सोमनाथ मंदिर, चर के वृहद अनुरक्षण कार्य के प्रथम चरण के लिए 50 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत हुई है।
पहले चरण में सिर्फ ऊपर-ऊपर की सफाई नहीं होगी, बल्कि मंदिर परिसर की वैज्ञानिक तरीके से सफाई और खुदाई कराई जाएगी।
यानी संभव है कि मिट्टी और मलबे के नीचे दबे ऐसे अवशेष सामने आएं, जो इस मंदिर और आसपास के प्राचीन इतिहास को समझने में नई कड़ी साबित हों।
मिले हुए अवशेषों की साफ-सफाई, संरक्षण और अभिलेखीकरण भी कराया जाएगा।
इसके बाद दूसरे चरण में मंदिर का व्यापक जीर्णोद्धार और परिसर का स्थलीय विकास प्रस्तावित है।
आखिर कितना पुराना है चर का सोमनाथ?
यहीं से इस मंदिर की कहानी और भी दिलचस्प हो जाती है।
मंदिर के काल और निर्माण को लेकर अलग-अलग दावे मिलते हैं। स्थानीय स्तर पर इसे चंदेलकालीन स्थापत्य परंपरा से जोड़ा जाता रहा है, जबकि चित्रकूट जिला प्रशासन की आधिकारिक पर्यटन वेबसाइट के अनुसार मंदिर के गर्भगृह की दीवार पर मौजूद अभिलेख इसके निर्माण को 14वीं शताब्दी के अंत में तत्कालीन शासक राजा कीर्ति सिंह से जोड़ता है।
इसलिए मंदिर की वास्तविक निर्माण-तिथि और इसके निर्माणकर्ताओं की पूरी कहानी को समझने के लिए पुरातात्विक अध्ययन और अभिलेखों की वैज्ञानिक जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
सौरठिया पहाड़ी से सोमनाथ तक…
जिला प्रशासन की वेबसाइट पर दर्ज विवरण के अनुसार जिस पहाड़ी पर मंदिर स्थित है, उसे पुराने समय में ‘सौरठिया पहाड़ी’ कहा जाता था। इसे सौराष्ट्र से जोड़कर भी देखा जाता है। आसपास मदनगढ़/मदना से जुड़े प्राचीन अवशेषों का भी उल्लेख मिलता है।
यही वजह है कि चर का सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि आसपास के पूरे क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता और स्थापत्य इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है।
पत्थरों में कैद है अद्भुत शिल्पकला
मंदिर परिसर और आसपास बिखरे भग्नावशेषों में देवी-देवताओं तथा विभिन्न आकृतियों की शिल्पकृतियों का उल्लेख मिलता है। कई पत्थरों पर बारीक नक्काशी आज भी दिखाई देती है।
यही बिखरे हुए अवशेष इस बात का संकेत देते हैं कि कभी यहां एक विकसित धार्मिक और स्थापत्य परिसर रहा होगा।
पुरातत्व के लिहाज से सबसे बड़ा सवाल यही है—
आखिर यह पूरा परिसर कितना बड़ा था?
यहां कितने मंदिर थे?
किस काल में इसका निर्माण हुआ?
और समय के साथ यह वैभव खंडहरों में कैसे बदल गया?
इन सवालों के जवाब आने वाले संरक्षण और पुरातात्विक कार्यों से मिलने की उम्मीद है।
नदी किनारे बना मंदिर, लेकिन रास्ता आज भी चुनौती
सोमनाथ मंदिर तक पहुंचने वाली सुविधाओं को लेकर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। मई 2026 में मुख्य विकास अधिकारी डीपी पाल ने मंदिर क्षेत्र का निरीक्षण कर पर्यटन विकास की संभावनाओं का जायजा लिया था। इस दौरान सड़क और वाल्मीकि नदी में रपटा निर्माण जैसे कार्यों की जरूरत भी सामने आई थी।
स्थानीय स्तर पर महाशिवरात्रि और सावन के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ पहुंचती रही है।
डीएम ने दिए सीमांकन के निर्देश
अब प्रशासन भी इस धरोहर को लेकर गंभीर नजर आ रहा है।
जिलाधिकारी पुलकित गर्ग ने मंदिर से संबंधित भूभाग की पैमाइश और सीमांकन कराने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही संरक्षण कार्यों में गुणवत्ता सुनिश्चित करने और मंदिर परिसर के समग्र स्थलीय विकास की योजना तैयार करने को कहा गया है।
चित्रकूट के पर्यटन मानचित्र पर नया अध्याय
चर का सोमनाथ अभी भी उन ऐतिहासिक स्थलों में है, जिनकी चर्चा चित्रकूट के प्रमुख धार्मिक स्थलों की तुलना में कम होती है।
लेकिन अगर वैज्ञानिक खुदाई में महत्वपूर्ण पुरावशेष सामने आते हैं और संरक्षण के बाद मंदिर परिसर को व्यवस्थित रूप से विकसित किया जाता है, तो चर का सोमनाथ चित्रकूट के धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ पुरातात्विक पर्यटन का भी बड़ा केंद्र बन सकता है।
सबसे बड़ा सवाल अब यही…
मिट्टी के नीचे क्या छिपा है?
क्या वहां किसी प्राचीन मंदिर परिसर के और अवशेष मिलेंगे?
क्या शिलालेख और स्थापत्य इस मंदिर की सही उम्र और निर्माणकर्ता की तस्वीर और स्पष्ट करेंगे?
या फिर सामने आएगा चित्रकूट के इतिहास का कोई ऐसा अध्याय, जो अब तक किताबों में भी दर्ज नहीं है?
50 लाख रुपये से शुरू होने वाला यह संरक्षण अभियान शायद इन्हीं सवालों के जवाब खोजने की शुरुआत है।
चर का सोमनाथ—एक मंदिर नहीं, पत्थरों में छिपी चित्रकूट की इतिहासगाथा है।

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